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Narmada Aanchal Rajput Samaj

"राजपूत" शब्द संस्कृत शब्द राज-पुत्र से निकला है, जिसका अर्थ है "राजा का पुत्र।" राजपूतों को उनके साहस, वफादारी और राजशाही के लिए जाना जाता है। ये योद्धा थे जो युद्ध लड़ते थे और शासन की ज़िम्मेदारियों की देखरेख करते थे। राजपूत पश्चिमी, पूर्वी और उत्तरी भारत और पाकिस्तान के क्षेत्रों से आए थे। छठी से बारहवीं शताब्दी तक राजपूत सर्वोच्च थे। राजपूतों ने बीसवीं शताब्दी तक राजस्थान और सौराष्ट्र की रियासतों पर सीमित बहुमत में शासन किया।
राजपूतों द्वारा लड़ा गया पहला युद्ध तराइन का युद्ध (1191 ईस्वी) था। इस युद्ध में चौहान वंश के पृथ्वीराज ने थानेश्वर के पास तराइन में मोहम्मद गोरी को हराया था। दूसरा तराइन का युद्ध (1192 ईस्वी) भी तराइन में ही लड़ा गया था, जिसमें पृथ्वीराज चौहान मोहम्मद गोरी से पराजित हुए थे। चंदवार के युद्ध (1194 ईस्वी) में जयचंद्र मोहम्मद गोरी से हार गए थे।
चंदवार के युद्ध (1194 ईस्वी) में जयचंद्र मोहम्मद गोरी से पराजित हुए थे।
खानवाल का युद्ध (1527 ईस्वी) मेवाड़ के राणा, राणा सांगा और फरगाना के बाबर के बीच हुआ था। यह वही युद्ध था जिसमें राणा सांगा युद्ध के मैदान में बुरी तरह घायल हो गए थे और पराजित भी हुए थे।
चंदेरी का युद्ध (1528 ईस्वी) चंदेरी के मेदिनी राय और बाबर के बीच लड़ा गया था, जिसमें बाबर विजयी हुआ था।
दिल्ली का युद्ध (1556 ईस्वी) भारत के इतिहास में एक उल्लेखनीय घटना थी, जब राजा हेम चंद्र विक्रमादित्य ने अकबर को हराया था। बाद में पानीपत में, हेम चंद्र विक्रमादित्य (हेमू) मुगलों से पराजित हुए।
मुगल-राजपूत युद्ध (1558 ईस्वी) मुगल साम्राज्य और राजपूतों के बीच हुआ था। उस समय अकबर सत्ता में था और वह राणा उदय सिंह द्वारा शासित मेवाड़ को जीतना चाहता था।
हल्दीघाटी का युद्ध (1576 ईस्वी) राजपूत इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है। यह युद्ध अकबर और महाराणा प्रताप (मेवाड़ के शासक) के बीच हुआ था और केवल चार घंटे तक चला था। उस समय, मेवाड़ को छोड़कर लगभग सभी राजपूत राज्य मुगलों के अधीन हो चुके थे। महाराणा प्रताप एक अजेय योद्धा थे और वे अपने वीर घोड़े चेतक पर सवार होकर युद्ध करते थे। ऐसा कहा जाता है कि उनके घोड़े चेतक ने किले की विशाल दीवार फांदकर महाराणा प्रताप को शत्रुओं से बचाया था।
संस्था के उद्देश:
1. संस्था के माध्यम से "गौ सेवा परमो धर्म" का प्रचार प्रसार करना ।
2. समाज के समग्र विकास एवं कल्याण हेतु कार्य करना नई पीढ़ी को रोजगार हेतु प्रशिक्षण एवं मागदर्शन देना।
3. समाज के प्रतिभावान छात्र-छात्राओं को सम्मानित कर प्रोत्साहित करना व समाज के शैक्षणिक स्तर को बढ़ाने हेतु प्रयास करना ।
4. संस्था के माध्यम से ब्लड डोनेशन कैंप आयोजित करना ।
5. संस्था के माध्यम से रामचरित्र मानस सुंदरकाण्ड का पाठ करना एवं प्रभु श्री राम के विचारो पर चलने के लिए सभी को प्रेरित करना!
6. शीतकालीन समय में गरीब एवं असहाय लोगों को संस्था के माध्यम से मदद करना, उन्हें भोजन एवं कपड़े वितरण करना ।
7. संस्था के माध्यम से वृक्षारोपण करना
8. युवा वर्ग को मंच देना तथा समाज के प्रति उनकी सोच को सामने लाने का प्रयास करना युवाओं को परंपरागत क्षत्रिय संस्कारो पर चलने की सीख प्रेरणा देते हुए, उन्हें नेतृत्व के लिए प्रोत्साहित करते सहयोग देना |
9. सामाजिक मुद्दे पर समाज में एकजुटता स्थापित करने का प्रयास करना ।
10. असहाय बुजुर्ग व्यक्तियों को संस्था के माध्यम से सहयोग एवं गरीब बच्चों को किताबें, खिलोने एवं मिठाई प्रदान करना ।
संस्था के कार्यक्रम :
1. नर्मदा जयंती पर आयोजन।
2. क्षत्रियकुलभूषण वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप जी की जयंती एवं उनकी पुण्यतिथि पर आयोजन।
3. दशहरा पर शस्त्र पूजन का आयोजन ।
4. प्रतिमाह रामचरित्र मानस सुंदरकांड का आयोजन ।
5. नव वर्ष मिलन समारोह आयोजन के साथ युवक युवक्ति परिचय समेलन आयोजित करवाना ।
6. रंगपंचमी पर मिलन समारोह का आयोजन ।
'राजपूत विजन' (Rajput Vision) का मतलब राजपूतों के साहस, वीरता, बलिदान और सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित दृष्टिकोण है, जो भारत के इतिहास में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाता है, जिसमें "राजा के पुत्र" (राज-पुत्र) होने के नाते शासन, सम्मान और कर्तव्य के प्रति निष्ठा शामिल है, जो सूर्यवंशी, चंद्रवंशी और अग्निवंशी जैसी विभिन्न वंशों में बंटे हैं और देश की रक्षा व संस्कृति के लिए प्रतिबद्ध रहे हैं।
राजपूत विजन के मुख्य पहलू (Key Aspects of Rajput Vision):
वीरता और बलिदान (Bravery and Sacrifice): "राजपूतों को उनकी अद्वितीय वीरता और देश के लिए दिए गए बलिदानों के लिए जाना जाता है, जैसे महाराणा प्रताप का मुगलों के खिलाफ संघर्ष।
सम्मान और वफादारी (Honor and Loyalty): वे अपने सम्मान, वफादारी और राजशाही के प्रति निष्ठा के लिए प्रसिद्ध हैं, जो उनके जीवन का अभिन्न अंग है।
सांस्कृतिक योगदान (Cultural Contribution): राजपूतों ने कला, साहित्य और किलों के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, साथ ही उन्होंने भारत की सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध किया है।
उत्पत्ति और वंश (Origin and Lineage): "राजपुत्र" (राजा का पुत्र) से उत्पन्न, वे सूर्यवंशी (सूर्य के वंशज), चंद्रवंशी (चंद्रमा के वंशज) और अग्निवंशी (अग्नि के वंशज) जैसे वंशों में विभाजित हैं।
कर्तव्यपरायणता (Duty-Bound): उनका विजन कर्तव्य, धर्म और प्रजा के प्रति समर्पण पर केंद्रित था, जिसमें युद्ध और शासन दोनों जिम्मेदारियां शामिल थीं।

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